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फर्जी मुठभेड़ दिखाकर 12 लोगों को डकैती में फंसाने का आरोप, 35 साल बाद पुलिसकर्मियों पर FIR

 Written By: Niraj Kumar
 Published : Oct 20, 2026 02:53 pm IST,  Updated : Oct 20, 2026 02:56 pm IST

यूपी पुलिस के 12 रिटायर्ड पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ के बाद 12 लोगों को डकैती के मामले में फंसाने का आरोप है।

UP Police- India TV Hindi
यूपी पुलिस (प्रतिकात्मक तस्वीर) Image Source : PTI (FILE)

कानपुर: कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ के बाद 12 लोगों को डकैती के मामले में फंसाने के आरोप में 12 रिटायर्ड पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। कानपुर में घटित यह मामला 1991 का है।  सीबी-सीआईडी की जांच में पुलिस के दावे गलत पाए जाने के करीब 35 साल बाद यह कार्रवाई की गई है। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने मंगलवार को बताया कि सीबी-सीआईडी के निरीक्षक सुशील कुमार की शिकायत पर महाराजपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसमें साक्ष्य गढ़ने, झूठे आरोप लगाने, अवैध रूप से हिरासत में रखने और चोट पहुंचाने से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं। 

इन धाराओं में केस दर्ज

पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने बताया कि मामला भारतीय दंड संहिता की धाराओं 194, 195, 182, 211, 218, 220, 323 और 342 के तहत दर्ज किया गया है। मामले की जांच सीबी-सीआईडी करेगी। उन्होंने बताया कि जांच में तत्कालीन थाना प्रभारी विद्यसागर त्रिपाठी और जांच अधिकारी रमेश चंद्र भटोले समेत 18 पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए थे। इनमें से छह की मृत्यु हो चुकी है। 

क्या था पूरा मामला?

प्राथमिकी के मुताबिक 22 अगस्त 1991 को पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ लोग जीटी रोड पर नरवल मोड़ के पास वाहनों को लूटने की योजना बना रहे हैं। ये लोग हथियारों से लैस हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया कि पुलिस के दावे के मुताबिक, 23 अगस्त की रात करीब साढ़े 12 बजे संदिग्धों ने बबूल की टहनियां डालकर सड़क रोक दी थी। इसके बाद हुई मुठभेड़ में राकेश पाठक समेत 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। 

पुलिस का दावा और सीआई़डी जांच

उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया था कि उनके पास से आर्म्स और विस्फोटक बरामद हुए थे। हालांकि, बाद में सीबी-सीआईडी की जांच में पुलिस का यह दावा गलत पाया गया। जांचकर्ताओं को एक डीसीएम वाहन के चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर विजेंद्र सिंह ने बताया कि पुलिस इन लोगों को उठाकर अपने वाहन में महाराजपुर थाने ले गई थी। उन्होंने मौके पर लूट की कोशिश या मुठभेड़ होने से इनकार किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पकड़े गए लोगों के साथ मारपीट की गई और हथियारों की बरामदगी का दावा मनगढ़ंत था। यह मामला राकेश पाठक के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक की शिकायत के बाद सामने आया। 

 400 वर्ग गज का प्लॉट मांगने का आरोप

उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन थाना प्रभारी त्रिपाठी ने उनके परिवार से बिना भुगतान किए 400 वर्ग गज का प्लॉट मांगा था। देव प्रसाद ने पत्रकारों को बताया कि भूखंड देने से इनकार करने पर उनके भाई और उसके साथियों को लूट के मामले में फंसा दिया गया। उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें भूखंड देने से मना कर दिया, जिसके बाद मेरे भाई के खिलाफ लूट का मामला दर्ज कर दिया गया।" देव प्रसाद ने बताया कि उच्च न्यायालय से अपने भाई को जमानत मिलने के बाद उन्होंने मामले की सीबी-सीआईडी जांच की मांग की थी। 

एक अधिकारी के मुताबिक जांच रिपोर्ट को 25 सितंबर 1995 को लखनऊ स्थित सीबी-सीआईडी मुख्यालय ने मंजूरी दी थी। देव प्रसाद ने बताया कि उनके भाई राकेश की आठ मई 2003 को कानपुर में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। प्राथमिकी में नामजद पुलिसकर्मियों में उपनिरीक्षक बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह और रमेश चंद्र; हेड कांस्टेबल हृदय नारायण तिवारी; कांस्टेबल तेज नारायण तिवारी, बैजनाथ, बृजेश कुमार, चंद्रबली, विद्याकांत शुक्ला, राम असरे और रमेश कुमार तिवारी; तथा चालक जागेश्वर प्रसाद शामिल हैं। मामले की जांच जारी है। 

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